माँ कात्यायनी का नाम कैसे पड़ा? How was mother Katyayani named?

 माँ कात्यायनी का नाम कैसे पड़ा?

How was mother Katyayani named?



योग माया, शक्ति स्वरूपा माता कात्यायनी कि सुन्दरता अति-आभा युक्त है, इनके स्मरण मात्र से ही मन निर्मल और शांत हो जाता है।

               माता माँ कात्यायनी का नाम कैसे पड़ा, इस विषय में एक कथा प्रचलित है। एक महान महर्षि थे जिनका नाम कत था। उनको एक पुत्र हुआ जिनका नाम कत्त्य पड़ा।

                कालांतर में उन्हीं महर्षि कत्त्य के कुल में एक बहुत ही प्रसिद्ध और प्रभावशाली महर्षि हुए जिनका नाम कात्यायन था। वे भगवती के अनंत भक्त थे। वर्षो तक वे माँ भगवती पराम्बा कि आराधना करते रहे।

                  वर्षों के-के तपश्या के पश्चात माँ भगवती "पराम्बा" , महर्षि कात्यायन के समक्ष प्रकट होकर वरदान मांगने को बोली। तब महर्षि कात्यायन अनुरोध पूर्वक आग्रह किये कि माँ भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें।

                माँ भगवती पराम्बा उनकी प्रार्थना को स्वीकार कर लीं। तो महर्षि कात्यायन कि पुत्री के रूप में जन्मी इस माता भगवती को कात्यायनी के नाम से जानते हैं।

               शक्ति स्वरूपा माता कात्यायनी कि पूजा नवरात्री के छठे दिन कि जाती है। षष्ठी के दिन साधक को अपने ध्यान को आज्ञां चक्र पर केन्द्रित करके साधना करना चाहिए.

          आज्ञा  चक्र का स्थान दोनों भौहों के बीच होता है। योग साधना में आज्ञां चक्र का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है।

                जो साधक अपना मन आज्ञा  चक्र केन्द्रित करके माता कात्यायनी कि साधना करता है। उस साधक को मन वांछित फल कि प्राप्ति होती है।

              छठे दिन माता कात्यायनी के साधना करने से साधक को चारों फल कि प्राप्ति होती है। उनको काम, अर्थ, धर्म और मोक्ष कि प्राप्ति होती है।

                  जिन कन्याओं कि शादी लम्बे समय से बाधित हो रही हो उन कन्याओं के लिए नवरात्री के छठे दिन कि पूजा विशेश महत्त्व के साथ करनी चाहिए.

                     उस दिन लड़कियों को सूर्योदय से पूर्व स्नान ध्यान करके, पूर्ण शृंगार करके माता के स्थान पर जाकर, या संभव नहीं हो तो अपने घर पर हीं किसी पवित्र स्थान पर बैठकर माता कात्यायनी के सुन्दर रूप का ध्यान करते हुए अपने मन को आज्ञां चक्र पर केन्द्रित करना चाहिए और शृंगार का समान अपने सामर्थ्य के अनुसार माता को पूरी श्रद्धा के साथ अर्पित करना चाहिए।


               ऐसा करने से कुआँरी कन्याओं को एक वर्ष के अन्दर ही इक्षा के अनुरूप वर के साथ विवाह हो जाता है और साथ ही जो स्त्री या पुरुष माँ भगवती कात्यायनी कि उपासना पूर्ण सरणागत होकर करता है उसके सारे रोग, कष्ट, क्लेश, शोक, संताप, भय आदि विनष्ट हो जातें हैं और लोगों के जीवन में सुख, शांति और ऐश्वर्य का वास होने लगता है।

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